Saturday, January 8, 2011

फानुस बनकर मिलोगे क्या...........


गुजरे लम्हों की कसम है तुम्हे

पाइ थी तुमने दिवानगी मेरी

कभी बैठ के इतमिनान से

देखो उनकी रवानी कभी



साहील बनाना चाहते थे

प्यार की कश्ती के मेरे

भवर मे छोड मुझको

पलट के भी नही देखा तुमने



तज्कीरा तो आयेगा तेरा

मेरे हर अश्क के साथ

खार दिये है कितने तुमने

प्यार के गुलाब के हाथ



जुनू मेरे प्यार का

महसूस करोगे मेरे लब्जों मे

कभी आइने मे झाको

तुम्हारे पिछे हम नजर आयेंगे



जुस्तजू तो रहेगी सदा

जिंदगी मे तेरे प्यार की

फानुस बनकर मिलोगे क्या

अंधेरी राह पर कभी?



स्नेहा (देवराई )

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